सुमति भारव्दाज

16-05-21

हमारी सांस्कृतिक परंम्पराओं में है प्रकृति का सरंक्षण संदेश

Nature
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June 08, 2020
21वीं सदी का मानव भौतिक विकास की अपनी लालसाओं और कामनाओं की पूर्ति हेतु अधांधुध भागा चला जा रहा था । यह भागमभाग इतनी तेज थी कि पीछे मुडकर देखने का भी किसी के पास समय नही था । मगर अचानक ही दूर देश से एक वायरस उड़ता हुआ आया और उसने पूरे विश्व में खलबली मचा दी. जीवन मानो थम सा गया! मौत के डर से मानव अपने- अपने घरों में बंद हो गये मगर बंद क्या हुए गाड़ियों की चिल्ल पौं, धुआ, प्रदूषण अचानक से गायब हो गये ! यानि मानव और उसके द्वारा बिछाये गये जीवन यापन के जाल सिकुडकर सिमटे नही कि मरणासन्न प्रायः प्रकृति के खुलकर सास लें लेने से मानों वह नव जीवन पाकर अपनी मृत्युशैय्या से अंगड़ाई लेकर उठ खड़ी हुई. शहरों के धुए की कालिमा खत्म होते ही उसमें छिपी हुई पर्वतों की श्रंखलाएं यहां तक की हिमालय और एवरेस्ट भी शहरों से नजर आने लगे । पेड पौधों की हरियाली इतनी हरी हो गई कि सब स्तब्ध रह गये. तरह-तरह की चिड़ियों, पक्षियों और कौओं कि आवाज सुनने को तरस गये कान सुबह की भोर तो क्या दिन भर इनकी चहचहाट सुन सुनकर मानो तृप्त से हो गये . हम मनुष्यों की इतनी भीड़ और शोर- शराबे से डरे सहमे छिपकर जीने को मजबूर वन्यप्राणी बेहिचक निकलकर यूं सड़कों पर विचरने लगे मानो कह रहे हो हे मनुष्य! बहुत हुआ !! अब तुम घरों में छिपकर रहों कुछ दिन इस धरणी धरा पर हमें भी चैन से विचरण कर लेने दों! शहरों और फैक्टरियों से प्रदूषित होकर काली पड़ गई गंगा, यमुना और तमाम छोटी-छोटी नदियां भी मनुष्यों के सभी क्रियाकलाप बंद हो जाने से निर्मल होकर यूं बहने लगी मानों सदियों से अपने उपर चढ़ी मैल को उन्होने किसी स्वच्छ सोते में डुबकी लगाकर धोया हो !! प्रकृति में यह सारे परिवर्तन मात्र मनुष्यों के कुछ महीने घर के अदर रहने से ही देखने को मिले तो क्या, प्रगति के पीछे भागता मनुष्य प्रकृति के प्रति इतना संवेदन हीन हो गया कि वह यही भूल गया कि इस पृथ्वी पर किसी का अलग अस्तित्व नही है ? वायु,जल,पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों की हिस्सेदारी ब्रहृमांड निर्माण में इस प्रकार सुव्यवस्थित की गई थी कि इसमें से यदि एक भी असंतुलित हुआ तो मानव जीवन का परिदृश्य ही बदल जाएगा. लेकिन हुआ तो यही!! जीवन की लालसाओं के चलते प्रकृति और उसकी संम्पदा का इतना दोहन हो गया कि इसके परिवेश में फलने फूलने वाले समाज के सांस्कृतिक मूल्य, भौतिक विचार, आचरण,रीति- रिवाज, पर्व-त्यौहार भी नीरस नही बल्कि नष्टप्रायः से हो गये क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति से ही जीवनरस और ऊर्जा लेकर स्वंय को पल्लवित और पोषित करते हुए जीवन स्थापन को आगे बढ़ाया था मगर जब प्रकृति ही अपने संरक्षण की मोहताज हो गई तो संस्कृति को तो पददलित होना ही था । लेकिन यह भी सच है भारत ही विश्वभर में एक ऐसा देश है जिसने अपनी सांस्कृतिक परंम्पराओं से प्रकृति को जोड़ते हुए उसका संरक्षण करने की प्रेरणा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में हर पीढ़ी को सौंपी है । नदियों को मां का दरजा देकर उन्हें नमन करना,कुँआ पूजना, तालाब और नदी किनारे स्नान पर्व और मेलों के आयोजन से जल के महत्व को बढ़ाना, सूरज को जल देना यह सब मान्यताएं हमारी उस सांस्कृतिक विरासत की धरोहर है जहां वृक्षों को संरक्षण देने के लिए तुलसी, बेल, नीम, पीपल, आंवला, बरगद, शमी, आदि की भी पूजा की जाती है. गाय को मां का दरजा देकर तो नाग को भी देवता मानकर पूजने की बात कही जाती है चिड़ियों और चिटियों को दाना और आटा तो कुत्ते को भी रोज रोटी खिलाने की पंरम्परा कोई चोचले बाजी या दकियानूसियत नही बल्कि इनके पीछे जीवों को संरक्षण देने का संदेश है । कदाचित् सृष्टि के आंरभ से ही मानव जानता था की पृथ्वी का आधार जल, जलवायु, जंगल और उसमें पनपने वाले पशु-पक्षियों से ही अस्तित्व में रहेगा वरना वह खतरे में पड़ जाएगा , शायद इसी लिए इन्हें पंरम्पराओं, धर्म और रीति-रिवाजों से जोड़ दिया गया ताकि इनकी आड़ में इन्हें संरक्षण तो मिले ही इनका सम्वर्धन भी होता रहे मगर आवश्यकता और विलासता में फर्क ना समझते हुए जिस प्रकार मानव ने पहाड़ों,पेड़-पौधो, नदियों, पशु-पक्षियों और वायु के परिवेश को दूषित कर जीवन चक्र को असंतुलित किया है उससे धरती के अस्तित्व में बने रहने पर ही सवाल उठने लगे है. पर्यावरण संरक्षण की प्रासांगिकता आज अचानक से इसलिए भी बढ़ चढ़ कर नजर आने लगी है क्योंकि लॉकडाउन के दौर में घरों में बंद होने पर ही हमने जाना है कि इसे संभालने में हमसे ही भारी भूल हुई है शायद इसीलिए एक प्राकृतिक आपदा ने हमारी दौड़ती भागती जिदंगी में यकायक चेतावनी यह दिखाने के लिए दी है कि प्रकृति में मनुष्य की दखलअदांजी जितनी कम होगी यह उतना ही फल फूलकर हमारे विकास और संरक्षण की सहयोगी बनेगी. फिर इसके संरक्षण को यदि संस्कृति और पंरम्पराओं का जामा भी पहनाना पड़े तो इसमें कोई हर्ज भी नही होना चाहिये !! पर्यावरण और उसके संरक्षण का दायरा भले ही काफी व्यापक है मगर छोटे-छोटे प्रयासों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मानव जाति के साथ-साथ पृथ्वी का अस्तित्व बनाए रखने का भी सवाल है ।
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