सुमति भारव्दाज

08-12-21

"बृज की काशी" और "तीर्थों का भान्जा" - बटेश्वर धाम

108 शिवालयों की श्रंखला, उल्टी यमुना बहने, घंटों के चढावे और दुर्लभ शिव पार्वती मूर्ति के लिए प्रसिध्द है यह धाम

Bateshwar Temple
July 20, 2020
उत्तर प्रदेश के जनपद आगरा में तहसील बाह के निकट "बटेश्वर धाम" बाबा भोलेनाथ का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है. कालिन्दी के तट पर अर्धचंद्राकार में बने 108 शिवालय और यमुना जल में देवालयों के दृश्यावलोकन के बीच सुबह शाम घंटों की नाद के साथ हर-हर महादेव, जय भोलेनाथ के जयकारे ऐसा मुग्धक दृश्य है जो "महातीर्थ बटेश्वर" में शिव के सामीप्य का भक्ति रस से साक्षात्कार करवाता है. यह सतयुगीन तीर्थ अपनी वेदकालिक, पौराणिक एंव प्राकृतिक सुरभ्यता की वह अनुपम पुनीत और पावन धरोहर है जिसने त्रेता और द्वापर से लेकर कलिकाल तक की यात्रा की है. "स्कन्द पुराण" के अंर्तगत "बटेश्वर महात्तम" प्रसंग विघमान है जिसमें यहां स्थित 108 मंदिरो में विराजमान सभी प्रमुख तीर्थों का क्रम से वर्णन मिलने के साथ उस क्षेत्र के महात्तम का भी उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार यह पावन क्षेत्र मथुरा मंडल में है जिसे बृज मंडल भी कहते हैं और जो बृज की 84 कोस की परिक्रमा के अर्तंगत आता है. बटेश्वर क्षेत्र का विस्तार दो योजन अर्थात आठ कोस लगभग 25 किलो मीटर है. इस तीर्थ के स्वामी भगवान बटेश्वर या बटुकनाथ जी हैं जो शिव का ब्रहृमचारी रूप है और हमेशा तप साधना में लीन रहते है. चारों ओर से सघन वृक्षों से घिरा और उंची नीची पहाड़ियों पर बसा यह क्षेत्र अध्यात्म साधना व आत्मोत्थान का ऐसा मोक्षदायी क्षेत्र बना कि पूर्वकाल में ऋषि मरीच, अत्रि ऋषि एंव दुर्वासा ऋषि ने भी इसी क्षेत्र को अपनी तप व साधना स्थली बनाकर कभी यहां ज्ञान व सिध्दियां प्राप्त की थी. त्रेताकाल में श्री राम के छोटे भाई महाराज शत्रुघ्न ने इसे अपने पुत्र "शूरसैन" के नाम पर "शूरसैन प्रदेश" नाम प्रदान किया तो द्वापर काल में यह योगेश्वर कृष्ण की पैतृक भूमि रही है जो उनके पितामह "शूरसैन की राजधानी" होने के साथ कृष्ण के पिता वासुदेव व बुआ कुन्ती की जन्मस्थली होने के अलावा 22वें तीर्थकंर भगवान नेमिनाथ की जन्म स्थली होने का गौरव भी रखती है । संभवतः योगी ऋषि मुनियों की तपो स्थली व सिध्द पुरूषों की जन्म स्थली होने के कारण ही देवाधिदेव शिव की इस पावन तट पर असीम कृपा बरसती है.पूर्वकाल में ब्रहृम ऋषियों का प्रशिक्षण केंद्र होने के कारण यहां संस्कृत विघा के अधिक प्रचलन स्वरूप समूचे भारत से भक्ति व श्रध्दा के अनुयायी, यति, योगी, इस सिध्द क्षेत्र के सानिध्य में शरणागत होते रहे हैं जिसके कारण इसे पूर्वांतर में "बृज की काशी" भी कहा जाता था. मंदिर के प्रांगण में लटकते पीतल के भारी-भारी घंटों से प्रतीत होता है कि भक्तगणों ने शिव से अपनी इच्छित मनोकामनाएं पाने के बाद प्रसाद रूप में घंटा चढ़ाकर उन्हें अपना आभार व्यक्त किया है. घंटो पर कई प्रसिध्द डाकूओं जैसे डाकू मानसिंह, पानसिंह तोमर और राजा भदावर जैसे कई राजाओं और उच्च अधिकारियों के गढ़े गये नाम बताते हैं कि शिव भक्ति के द्वार न केवल सब के लिए खुले है बल्कि उनकी कृपा और आशीष अपने सभी भक्तों पर समान एंव अनवरत बरसती है. यद्पि यह एक पौराणिक एंव प्रसिध्द महादेव जी का तीर्थ स्थल है जिसकी महिमा यमुना में स्नान और उसके तट पर बने 108 मंदिरों की स्तुति, पूजन प्रदक्षिणा एंव घंटों के नाद से मंडित होती है तथापि इसके इतिहास में कई जनश्रुतियां भी प्रचलित हैं. एक लोकप्रिय जनश्रुति के अनुसार राजा भदावर और तत्कालीन राजा परमार अच्छे मित्र थे जिसके चलते दोनों ने वचन लिया कि आने वाले समय में जिसके भी यहां कन्या पैदा होगी वह दूसरे के पुत्र से उसकी शादी करेगा, मगर दोनों के ही यहां कन्या पैदा हुई, किन्तु राजा भदावर ने कन्या होने की बात छुपा पर पुत्र होने की घोषणा कर दी और राजा परमार की कन्या से विवाह का रिश्ता तय कर दिया. समय आने पर जब विवाह का समय आया और राजा भदावर की कन्या को अपने पिता के वचन और झूठ का पता चला तो वह पिता की लाज बचाने के लिए बटेश्वर के घाट पर भगवान शिव की तपस्या करने लगी. जैसे ही विवाह का दिन नजदीक आया पिता को संकट से उबारने के लिए उसने यमुना में छलाँग लगा दी मगर कि्ंविदन्ती है कि जब उस कन्या को नदी से बाहर निकाला गया तो इस पावन स्थली के तप के माहत्तम से वह कन्या पुरूष रूप में परिवर्तित होकर निकली. कहते हैं उसी स्थान पर आज तक यमुना चार किलो मीटर तक उल्टी घारा के रूप में बह रही है. शिव को अपनी माहनता, उदारता एंव औघढ़ता के कारण देवों के देव महादेव एंव सर्वत्र एंव अनंत काल से व्याप्त होने के कारण आदिदेव भी कहा जाता है जिनका कोई रूप व स्वरूप न होने के कारण सर्वत्र "शिवलिंग" रूप में ही पूजा जाता है. मगर बटेश्वर में शिव की पार्वती एंव गणेश के साथ अनोखी दुर्लभ एंव भव्य प्रतिमा भी स्थापित है जो न केवल अंगाभूषणों से अंलकृत है बल्कि शिव का स्वरूप यहां बड़ी-बड़ी आंखों और मूछों वाला होने के साथ बैठने की अवस्था भी बड़ी अद्भुत है शिव की यह अनोखी प्रतिमा विश्वभर में अकेली होने के कारण जागृत प्रतिमा मानी जाती है. शिक्षा एंव दीक्षा से पूर्ण बटेश्वर धाम शिव की पावन स्थली तो है ही अपने धन धान्य से भी यह स्थल एक समय में काफी समृध्द रहा है, उंची-उंची खाली पड़ी हवेलीयां, किले जो वर्तमान में बेशक भग्नावस्था में मिट्टी के टीले मात्र ही है इस बात का साक्षात् प्रमाण है. प्राचीन समय में दिवाली से कार्तिक पूर्णिमा तक लगने वाला भव्य पशु मेला जिसमें हाथी,घोड़े, ऊंट से लेकर सभी उपयोगी पशु बिक्री हेतु लाये जाते थे इस क्षेत्र की उन्नत आर्थिक स्थिति का परिचायक था. आजादी से पूर्व स्वंतत्रा संग्राम में भी इस क्षेत्र की अहम भूमिका रही है जिसमें अनेको शूरवीरों के साथ भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने भी कई प्रमुख घटनाओं में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था क्योंकि अटल जी इसी क्षेत्र के रहने वाले थे. पुरातन घरोहर से समृध्द यह क्षेत्र अपने गर्भ में एक लंबा एंव गौरव शाली इतिहास छिपाये है जो अपनी स्वाभाविक्ता, रूप व वैभव को त्याग कर आज भले ही ऊषर व श्रीहीन हो गया है मगर सप्त तीर्थों में गिने जाने वाले इस धाम की महिमा इतनी अधिक है कि समस्त तीर्थ इसके "मातुल" अर्थात "मामा" कहे जाते है और इसे उनका "भान्जा" होने का श्रेष्ठतम् दर्जा प्राप्त है कहते हैं आज भी समस्त तीर्थ करने के बाद अंत में जब तक इस स्थान पर आकर शिव की पूजा अर्चना के साथ यमुना में स्नान के बाद मंदिरों की प्रदक्षिणा कर ब्राह्मण भोजन आदि नहीं दिया जाता, तीर्थादि करने का संपूर्ण फल व लाभ प्राप्त नही होता. सर्वपाप विनाशक एंव सभी प्रमुख तीर्थों के यहां कलांतर से विराजमान होने के कारण यह ज्योर्तिमय "तीर्थ बटेश्वर" सभी के लिए स्तुत्य एंव प्रणम्य है.
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