सुमति भारव्दाज

21-09-21

त्रिफला से कायाकल्प

Trifala
October 17, 2020
"त्रिफला" यानि तीन फलों से मिलाकर बनाया हुआ ऐसा मिश्रण जिसमें तीनों फलों आँवला, हरड़ व बहेड़ा के औषधीय गुण मिलकर इसे अमृत तुल्य बना देते हैं। आयुर्वेद के अनुसार त्रिफला में मौजूद इन तीनों के गुण संपूर्ण शरीर के साथ त्वचा व बालों को भी इतना अद्भुत लाभ पहुंचाते हैं कि यह मनुष्य का कायाकल्प करने का भी सार्मथ्य रखता है। आमतौर पर त्रिफला को पेट सम्बन्धी रोगों से निजात पाने के लिए जाना जाता है। खासकर पेट में कब्ज़ की शिकायत हो या शारीरिक सुस्ती दूर करनी हो तो घरेलू उपचार के तौर पर सबसे पहले त्रिफला का ही ध्यान आता है। त्रिफला के सेवन से पेट की इतनी अच्छी तरह सफाई होती है कि गैस, अपच, ऐसीडिटी कब्ज़ व आँव जमने की समस्या जड़ से खत्म हो जाती है। चूंकि ऐसा कहा भी जाता है कि सभी छोटी से लेकर बड़ी बिमारियों तक की जड़ पेट की खराबी से जुड़ी होती है इसलिए पेट की सभी समस्याएं त्रिफला के सेवन से दूर होते ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है और मनुष्य स्वस्थ व निरोगी होकर लंबी आयु को प्राप्त होता है। आयुर्वेद त्रिफला के बहुपयोगी गुणों के कारण इसे अपनी चिकित्सा पध्दति में रीढ़ की हड्डी मानता है। उनके अनुसार यह वात, पित, कफ-त्रिदोष नाशक रसायन होने के कारण मनुष्य को सभी बिमारियों से दूर रखता है, लेकिन इसके लिए इसका नियमित सेवन अत्यंत आवश्यक है। निसंदेह केवल दो वर्ष तक त्रिफला के नियमित सेवन से आप सर्व रोग मुक्त, चार वर्ष तक सेवन से अनुपम सौंदर्य और कान्तियुक्त और आठ वर्ष तक प्रयोग से वृध्द से पुनःयुवा जैसा अनुभव कर सकते हैं। शारीरिक कायाकल्प करना हो तो लम्बे समय तक कठिन परहेज, असीम धैर्य और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है जो कि आज के भाग दौड़ के जीवन में मनुष्य के लिए आसान नहीं है क्योंकि पूर्ण कायाकल्प के लिए त्रिफला चूर्ण को बारह वर्ष तक नियमपूर्वक लेने का विधान है, परंतु यदि एक स्वस्थ व्यक्ति अपना स्वास्थ्य कायम रखने के लिए 'रसायन' के रूप में निरन्तर लम्बे समय तक त्रिफला का विधिवत प्रयोग करता है तो अन्तिम समय तक र्स्फूत व निरोग बने रहने की गारंटी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्रियों के अनुसार अनुभव सिध्द है। निर्माण विधि पीली हरड़, बहेड़ा, आंवला इन तीनों सूखे फलों की गुठली निकालने के बाद इन्हें अलग-अलग बारीक कूट-पीस - छान कर प्रत्येक का अलग-अलग चूर्ण बना लें और फिर 1:2:6 के अनुपात में मिलाकर रख लें। यदि हरड़ का चूर्ण 20 ग्राम हो तो, बहेड़े का चूर्ण40 ग्राम और आंवलो का चूर्ण 60 ग्राम लेकर मिलाना चाहिए और इस मिश्रण को किसी शीशी में भरकर बरसाती हवा से बचाते हुए रखना चाहिए। सेवन-विधि सुबह उठने के बाद खाली पेट त्रिफला-चूर्ण ताजा पानी के साथ प्रतिदिन केवल एक बार लेना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार बच्चे हो या वयस्क, जितनी आयु हो, उसके अनुसार कम व ज्यादा चूर्ण ताजा पानी के साथ लेना चाहिए। त्रिफला सेवन के पश्चात् एक घंटे तक दूध, चाय व नाश्ता इत्यादि न लें । दूसरे शब्दों में औषधि लेने के लिए एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ न लें। इस नियम का कठोरता से पालन करना आवश्यक है क्योंकि त्रिफला- सेवन काल में एक-दो बार पतले दस्त भी आ सकते हैं। भिन्न-भिन्न ऋतुओं में अनुपात – हमारे यहां साल में छः ऋतुएं होती है और प्रत्यके ऋतु में त्रिफला लेते समय नीचे दी गई अनुपात-तालिका के अनुसार एक-एक वस्तु त्रिफला-चूर्ण में मिलाकर ऋतु के अनुसार ताजे पानी के साथ प्रतिदिन एक बार लें । जो लोग शहद नही खाते है, वे शहद के स्थान पर त्रिफला चूर्ण 2-3 चम्मच बुरा या पिसी हुई चीनी मिलाकर ले सकते है । मास एंव ऋतु त्रिफला के साथ मिलाई अनुपात जाने वाली वस्तु का नाम ग्रीष्म ऋतु (14मई से गुड़ 1/4 भाग 13जुलाई ) वर्षा ऋतु (14जुलाई से सैंधा नमक 1/8 भाग 13सितम्बर तक) शरद ऋतु (14सितम्बर से देशी खांड 1/6 भाग 13नवम्बर तक) हेमन्त ऋतु (14नवम्बर से सौंठ का चूर्ण 1/6 भाग 13जनवरी तक) शिशिर ऋतु (14जनवरी से छोटी पीपल 1/8भाग 13मार्च तक) का चूर्ण वसन्त ऋतु (14मार्च से 13मई ) शहद अंदाज से इतना मिलाएं कि चाट कर खा सकें। यदि त्रिफला चूर्ण को उपरोक्त तरीके से लगातार बारह वर्ष सेवन किया जाए तो निम्न लाभ बताए गए हैं एक वर्ष तक सेवन करने से सुस्ती दूर भाग जाती है । दो वर्ष तक सेवन से सर्व रोगों का नाश होता है । तीन वर्ष तक सेवन से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है । चार वर्ष तक सेवन करने से चेहरे पर अपूर्व सौंदर्य निखर उठता है । पांच वर्ष तक सेवन करने से बुध्दि का खूब विकास होता है । छः वर्ष तक सेवन करने से बल की अपरिमित वृध्दि होती है । सात वर्ष तक सेवन करने से सफेद बाल पुनः काले होते है । आठ वर्ष तक सेवन करने से वृध्द व्यक्ति पुनः युवा बन जाता है । नौ वर्ष तक सेवन करने से दिन में तारे स्पष्ट दिखने लगते है । दस वर्ष तक सेवन करने से कण्ठ में सरस्वती का वास हो जाता है और हृदय में दिव्य प्रकाश की अनुभूति होती है । उपरोक्त गिनाए गए लाभ भले ही आज अतिशयोक्ति पूर्ण लगे परन्तु इतना जरूर है कि वास्तविक लाभ कायाकल्प के समक्ष होते है अर्थात् शरीर में कैसी भी बीमारी हो, वह स्थायी रूप से ठीक हो जाती है और व्यक्ति वृध्द से युवा जैसा हो जाता है ।
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