सुमति भारव्दाज

04-08-21

फन डे- 'हैलोवीन'

Helloween festival
October 31, 2020
हर वर्ष 31 अक्टूबर को विश्व भर में हैलोवीन दिवस मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने की वैसे तो यूरोपीय देशों की ही परम्परा है मगर, भारत में भी अब इसे उत्साह पूर्वक मनाया जाने लगा है। वैसे तो इस त्यौहार को मनाने में हर आयु वर्ग के लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते है मगर, बच्चों व खासकर युवा वर्ग में इसे मनाने के लिए विशेष जोश व उत्साह रहता है आज जबकि यह दिवस पूरे विश्व में मनाया जा रहा है तो आइए जानते है क्या है हैलोवीन !! मरे हुए लोगों की आत्माओं से जुड़ा है हैलोवीन हर देश की अपनी सांस्कृतिक परम्पराएं होती हैं और उसी के अनुसार कुछ त्यौहार या दिवसों को मनाने का चलन भी होता है. हमारे देश भारत में भी कई ऐसे त्यौहार हैं जिन्हें हम हंसी खुशी मनाते हैं मगर, 'श्राध्द' हमारे यहां ऐसा पर्व है जिसे हम अपने परलोक सिधार गए लोगों की याद में 'श्रध्दा पूर्वक' मनाते हैं. इसी तरह यूरोपीय देशों में भी क्रिसमस, गुडफ्राइडे, ईस्टर व थैंक्स गिविंग इत्यादि लोग खूब हंसी खुशी से मनाते हैं मगर, अपने मरे हुए लोगों की याद में वह 'हैलोवीन दिवस' मनाते हैं जिसमें अपने पूर्वजों को याद करने का भाव व श्रध्दा तो होती है मगर इसे मनाने का ढ़ंग अत्यंत अनोखा या यों कहें डरावना होता है। ऐसा माना जाता है कि लगभग 2000 वर्ष पहले सेल्ट्स प्रजाति के लोग पूरे यूरोप में बसे थे औऱ इस दिन को वह सेल्टिक केलेंडर के अनुसार नए वर्ष के रूप में मनाते थे. इस दिन से ठंड के मौसम की शुरूआत होने के अलावा फसल कटने के मौसम का आखिरी दिन भी होता है. गैलिक परम्पराओं को मानने वाले अधिकतर लोग यह मानते हैं कि इस निर्घारित दिन पर लोक और परलोक के बीच की दूरी कम हो जाती है औऱ परलोक से मरी हुई आत्माएं उठ कर धरती पर अपनों से मिलने आती है। इसमें बुरी और अच्छी दोनों ही तरह की आत्माएं होती हैं. बुरी आत्माएं चूंकि अशांत होती है इसलिए वह धरती पर आकर फसलों को नुक्सान पहुंचाती है और जीवित लोगों को भी परेशान करती हैं. इसलिए बुरी आत्माओं का प्रवेश अपने घर के अंदर रोकने के लिए लोग कई तरह के उपाय करने लगे. मांसाहारी व तरह-तरह का भोजन बनाकर वाईन के साथ घरों से बाहर सड़कों पर रख दिया जाता था ताकि वह बाहर से ही भोजन प्राप्त कर तृप्त होकर लौट जाएं. लोग डरावने भूतों जैसे वस्त्र पहनकर व मेकप लगा कर या डरावने मुखौटे लगा कर घरों से बाहर निकलने लगे ताकि बुरी आत्माएं उन्हें अपना ही संगी साथी समझें और उन्हें तंग न करें. धीरे-धीरे लोग घरों के बाहर नकली चमगादड़े, कव्वें, मकड़ी के जाल, और नकली नरकंकाल तक बुरी आत्माओं को भ्रमित करने के लिए लटकाने लगे इतना ही नहीं घरों से दूर अलाव जलाकर उनमें जानवरों की हड्डियां डाल दी जाती थीं ताकि आत्माएं घरों तक न पहुंचे. बुरी आत्माओं के डर को दूर भगाने के लिए स्वयं डरावने बनकर घूमने के इस रिवाज़ में बच्चे और युवा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे मगर, बड़े बुजुर्ग अच्छी व बुरी दोनों आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थनाओं का आयोजन करते थे. कैसे मनाते है हैलोवीन लगभग 9 वीं सदी के आसापास जब इसाई धर्म सेल्टिक प्रजातियों के बीच फैलने लगा तो माना जाता है कि इसाई पोप्स ने एक नवंबर को चर्च में 'ऑल सेंट्स डे' मनाने की शुरूआत की जिसके एक दिन पहले यानि 31 अक्टूबर को 'हेलोस ईव' मरी हुई आत्माओं की याद में ईसाई धर्म में पहले से ही मनाया जाता था. पोप्स द्वारा इसे ईसाई धर्म में मिलाने की कोशिश के कारण 'ऑल सेंट्स डे' और 'हेलोस ईव' एक ही दिन मनाया जाने लगा जो धीरे-धीरे 'ऑल हेलोस ईव' से 'हैलोवीन' के रूप में मनाया जाने लगा. आज हैलोवीन आयरलैंड, स्कॉटलैंड, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया व पूरे अमेरिका में कई परम्पराओं व रीति-रिवाज़ों से मनाते है. लोक कथाओं के अनुसार हैलोवीन पर हर घर में जैक-ओ-लैंटर्न यानि कद्दू की लालटेन बनाने का रिवाज़ है जिसमें कद्दू को खोखला करके उसमें आंख, नाक और मुंह तरह-तरह के डरावने तरीकों से बनाकर उनमें बल्ब या मोमबत्तियां जलाकर रख दी जाती हैं और बाद में इन कद्दूओं को मिट्टी में एकत्र करके दफना दिया जाता है. बच्चे कद्दू के आकार के बैगस लेकर घर-घर जाते हैं और घर के मालिक से पूछते हैं 'ट्रिक और ट्रीट'? यदि मालिक 'ट्रिक' कहता है तो उसे बच्चों को तरह-तरह की ट्रिकस द्वारा डराना होता है और यदि 'ट्रीट' कहे तो उसे बच्चों को तरह-तरह के उपहार खेल-खिलौने, चॉकलेट्स, कैंडी व कैंडीकार्न आदि देकर ट्रीट देनी पड़ती है। इस दिन लोग थीम पार्टियां रखकर कई तरह की डरावनी वेशभूषाएं पहनकर एक दूसरे को डराने का प्रयत्न भी करते हैं. भूत, मॉनस्टर, समुद्री डाकू, वैम्पायर, चमगादड़, नरकंकाल, शैतानी भेड़िया व राक्षस जैसा मुखौटा लगा कर मेकप व वस्त्र आदि पहन कर लोग अपने आप को डरावना बना लेते हैं और एक दूसरे को डराने की कोशिश करते हैं. काली बिल्ली, काली चमगादड़ों व काले कव्वौं को भी इस दिन बुरी आत्माओं के साथ जोड़ कर देखा जाता है। यहां तक की काली बिल्ली को तो हैलोवीन की शाम को देखना या उसका रास्ता काटना साक्षात् वैम्पायर या चुडैल को देखना और साल भर के लिए अशुभ माना जाता है. कई जगह पर तो इस दिन काली बिल्ली को देखना इतना अशुभ मानते हैं कि उसे देखते ही मार डालते है। इस दिन लोग कई पारम्परिक खेल भी खोलते हैं व भविष्य के लिए भविष्यवाणियां भी करते हैं। इसके अलावा सेब, कद्दू व कार्न आदि से पारम्परिक व्यंजन, केक व पेय आदि भी बनाए जाने की परम्परा हैं जिसे सभी परिवार के लोग मिलकर बनाते, बांटते व खाते हैं और इसे एक फन डे के रूप में मानते हैं। परम्पराओं व रीति- रिवाज़ों में यह दिवस भले ही हमारी भारतीय परम्पराओं में अपने बुजुर्गो को याद करने के तरीकों से मेल न खाता हो मगर दिवंगत आत्माओं को याद कर उन्हें 'श्रध्दा सुमन' अर्पित करने का यह 'फन डे' हैलोवीन कम रोचक नहीं है।
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