Udbhaw Shandilya

21-01-21

आखिर कैसे संरक्षित होगी जैव-विविधता?

Environment
December 08, 2020
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का पर्यावरण से संबंधित एक बहुत ही महत्वपूर्ण उद्धरण है कि 'पृथ्वी सभी व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त है किंतु उनके लालच की पूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं ।गाँधी जी ये बातें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि मानव को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करना चाहिए ताकि वर्तमान एवं भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के बीच संसाधनों की सर्वसुलभता एवं अभिगम्यता पर कोई विरोधाभास न उत्पन्न हो। सतत् विकास की अवधारणा भले ही 1983 में गठित 'ब्रंटलैंड आयोग' के 1987 में प्रकाशित अंतिम रिपोर्ट 'आवर कॉमन फ्यूचर' के आने के बाद आया हो किंतु गाँधी जी ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन 1930 एवं 1940 के दशक में अपने विचारों द्वारा हमें सतत् विकास की मूल अवधारणा से परिचित तो अवश्य ही करवा दिया था। भारत विविधताओं का देश है एवं भारतीय ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में पर्यावरण को यहां प्रकृति एवं जीवन का अभिन्न अंग माना जाता रहा है तथा इसके अनेकों प्रमाण भी हैं। अथर्ववेद में पृथ्वी के लिए समर्पित एक अलग ही 'पृथ्वीसूक्त' की रचना की गई है जहां पृथ्वी को माता एवं मानवों को उसके पुत्र के रूप में स्थापित किया है,ऋग्वेद में वायु को 'ब्रह्मा' की उपाधि दी गई है, ईशोपनिषद में प्राकृतिक संसाधनों को दूरदर्शी होकर उपयोग में लाने के लिए बात कही गई है ताकि संसाधनों का समुचित प्रयोग हो सके और तो और महाकवि कालिदास ने अपने 'कुमारसंभवम्' के पहले सर्ग को हिमालय के लिए समर्पित किया है, जहां उन्होंने हिमालय को 'देवतात्मा' से संबोधित किया है। सवाल यह उठता है कि जिस देश का पर्यावरण संरक्षण को लेकर इतना विराट इतिहास रहा हो आखिर वहां पर पर्यावरण के लिए क्यों रोना? कारण साफ है,प्रकृति को खुद के वश में करने की चाह, सांस्कृतिक क्रियाकलापों के बहाने पारिस्थिति की तंत्र को नष्ट करने की गंदी मानसिकता एवं सबसे महत्वपूर्ण खान-पान। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक रिपोर्ट के मुताबिक 1980 के बाद से पूरे विश्व में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ी है। क्या कारण हो सकते हैं इस तीव्रता के बढ़ने के, क्या आपने ध्यान दिया है? हमारा गढ़ा हुआ विकास का मानक, आर्थिक सुदृढ़ता को पाने के लिए पर्यावरण को नोंच डालने की विकृत मानसिकता और तो और तारतम्य एवं लंबा टिकने वाले पर्यावरण संरक्षण के पारंपरिक आदर्शों से क्षणभंगुर एवं तथाकथित आधुनिक वैज्ञानिक विधियों की तरफ हमारी दूरदर्शिता का स्थानांतरण होना। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम(UNEP) के अनुसार जैव-विविधता विशिष्टतया अनुवांशिक,प्रजाति तथा पारिस्थितिकी तंत्र के विविधता का स्तर मापता है जिसे वाल्टर जी.रोजेन ने 1985 में दिया था। ये उन सारी चीजों को खुद में आत्मसात् किये हुए है जो प्रकृति को वास्तव में प्रकृति बनाती है।आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सबसे पहली आवाज 1962 में 'रासेल कारसन' ने अपनी किताब 'द साइलेंट स्प्रिंग' के द्वारा उठाया था जिसके द्वारा उन्होंने अमेरिका में डीडीटी से होने वाले खतरे से आगाह किया था एवं यह बात बतायी थी कि वो बसंत जो कभी चिड़ियों की चहचहाहट से गूंजता था, अब चुप है। उसके बाद 1967 में प्रकाशित 'गैरेट हार्डिन' ने अपनी किताब 'ट्रेजेडी ऑफ द कॉमनस' में साधारण जनमानस से होने वाली त्रासदी का बहुत ही व्यापक दृष्टि में उल्लेख किया है। फिर 1971 में ईरान के रामसर में आयोजित सभागम ने जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए आधुनिक आद्रभूमि की नींव रखी। भारतीय उपमहाद्वीप में भी कुल 37 आद्रभूमि इसी सभागम द्वारा ही स्थापित की गयी है।1972 में MIT, अमेरिका द्वारा प्रकाशित 'द लिमिट्स टू ग्रोथ' में घातांकीय रूप से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्था एवं जनसंख्या को संसाधनों की सीमित उपलब्धता से जोड़ने का प्रयास किया गया था। यह वही वर्ष है जब पर्यावरण को लेकर पहली बार स्वीडन के स्टाकहोम में पृथ्वी शिखर-सम्मेलन का आयोजन किया गया था जबकि कुछ लोग 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनारियो में आयोजित सम्मेलन को पहला पृथ्वी शिखर-सम्मेलन मानते हैं।1972 के स्टाकहोम सम्मेलन के बाद ही भारत ने भी 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पारित किया जिसने देश के राष्ट्रीय उद्यान,अभ्यारण्य एवं बायोस्फियर रिजर्व की स्थापना का मार्ग स्पष्ट किया।फिर 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व: श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली के साथ मिलकर 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू किया जिससे बाघ संरक्षित हो पाएँ। कालांतर में 1980 में वन संरक्षण कानून एवं 2006 में वन कानून को पारित किया। हालांकि वन कानून औपनिवेशिक भारत में पहले भी 1887 एवं 1927ई. में पारित हुए थे।जैव-विविधता संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम पहला 1992 एवं दूसरा 2002 में उठाया गया जब पहला UNO के तत्वावधान में एक अंतरराष्ट्रीय संधि CBD:-Convention on Biological Diversity आया एवं भारतीय उपमहाद्वीप इसके संस्थापक सदस्यों में से एक है। इसी संधि के अंतर्गत दो प्रोटोकॉल जोड़े गए जो मुख्यतः कार्टाजेना एवं नागोया थे। दूसरा 2002 में भारतीय संसद ने जैवविविधता संरक्षण अधिनियम पारित किया। कार्टाजेना प्रोटोकॉल के अंतर्गत ही भारत में पर्यावरण,वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत GEAC (Genetic Engineering Appraisal Committe) का गठन किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य बायो सेफ्टी सुनिश्चित करना था जिसकी अवधि 2016 में समाप्त हो गयी तो इसी प्रोटोकॉल के अंतर्गत एक अनुपूरक प्रोटोकॉल को प्रस्तावित किया गया जिसे नागोया-कुआलालंपुर अनुपूरक प्रोटोकॉल के नाम से जानते है। नागोया प्रोटोकॉल को वर्ष 2010 में जापान के नागोया शहर में आयोजित महासम्मेलन में प्रस्तावित किया गया जिसका संबंध ABS अर्थात् Access and benefit sharing से है। नागोया के 10वें सम्मेलन में CBD(Convention on Biological Diversity) के सदस्य राष्ट्रों ने जैव-विविधता के संरक्षण के लिए 10वर्षीय लक्ष्यों को स्वीकार किया है जिसे ऐची(Aichi) लक्ष्य नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत तटवर्ती क्षेत्रों में विविधता को 1% से 10% तक, कम से कम 15% पारिस्थिति की तंत्र को पुनर्स्थापित करना एवं कोरल रीफ संरक्षण विशेष प्रयास इत्यादि का प्रावधान है। ऐसी लाख कोशिशों के बाद भी इंडिया स्टेट ऑफ फारेस्ट रिपोर्ट, 2019 के अनुसार भारत में जंगल का हिस्सा इसके कुल क्षेत्रफल का 21.67% है जबकि एक राष्ट्र में समुचित पारिस्थितिक संतुलन के लिए कम से कम उसके कुल क्षेत्रफल के 33% भाग पर जंगल होना आवश्यक है। जंगलों की कटाई ने जैव-विविधता के नाश, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन की गति को और भी ज्यादा तेज कर दिया है। क्या जैवविविधता संरक्षण के लिए महज सम्मेलन, प्रोटोकॉल एवं कानून काफी है या फिर हमें सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयामों को भी संज्ञान में लेना चाहिए? जैवविविधता को संजोए रखने के लिए यह अति आवश्यक है कि हमारी योजना अद्य:स्तर से चोटी की ओर उन्मुख हो ना कि चोटी से निचले स्तर की ओर और यह तभी संभव हो सकता है जब हमारी योजनाओं में साधारण जनमानस की ज्यादा से ज्यादा सहभागिता होगी।जैवविविधता संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें Species Identification(प्रजाति अभिज्ञान) की समझ हो। कोई प्रजाति तभी बचायी जा सकती है जब उसके गुण-दोषों से जनमानस का परिचय हो। हरित क्रांति के दौरान भारत लाये गए गाजर घास (पार्नेथियम) को अगर लगातार पाँच दिनों तक साफ किया जाए तो फिर मजदूर को अस्थमा जैसी घातक बीमारी पकड़ सकती है। गाँवों में गाजर घास यदि मवेशी खा ले तो उन्हें दस्त हो जाता है। आवश्यकता है इसी गुण-दोष को सेमिनार एवं प्रतियोगिताओं के माध्यम से सबसे निचले स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की, तब जाकर ही जैवविविधता को वास्तविक रूप में संरक्षित किया जा सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण चीज जिसके द्वारा जैवविविधता को बचाया जा सकता है वह है इको-फेमिनिज्म(Eco-Feminism) की अवधारणा को और भी ज्यादा सुदृढ़ करना। इकोफेमिनिस्ट स्त्री एवं प्रकृति के संबंधों की व्याख्या करते हैं। महिलाएं प्रकृति के बहुत करीब होती हैं तथा यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि वो भी प्रकृति की एक प्रतिमूर्ति ही हैं क्योंकि जिस प्रकार प्रकृति पारिस्थिति की तंत्र को पैदा करने में सक्षम है उसी प्रकार महिलाएं भी अपनी कुक्षि से मानव को जन्म देकर प्राकृतिक चक्र को पूर्ण करती हैं। यदि महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा मौका दिया जाएं तो जैवविविधता संरक्षण में उनकी भूमिका एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। तीसरी महत्वपूर्ण चीज जिसके द्वारा जैवविविधता को रक्षित किया जा सकता है वह है विकास के आयाम में बदलाव। जो विकास आज मूलतः धन-संचयन एवं आर्थिक लोलुपता के कारण प्रकृति को नोंच रहा है, उसे बस आवश्यकता है जीविकोपार्जन तक सीमित करने की यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान पाने की इच्छा छोड़कर सतत् विकास एवं जीविकोपार्जन तक सीमित हो जाएं तो फिर जैवविविधता एवं प्रकृति पुन: अपने वास्तविक रूप में लौट जाएंगे।
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